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महाभारत 7.25.38
स तु लब्ध्वान्तरं नागस्त्वरितो रथमण्डलात्निश्चक्राम ततः सर्वान्परिचिक्षेप पार्थिवान्
sa tu labdhvāntaraṃ nāgastvarito rathamaṇḍalātniścakrāma tataḥ sarvānparicikṣepa pārthivān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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