महाभारत 7.25.4स नाग इव नागेन गोवृषेणेव गोवृषःसमाहूतः स्वयं राज्ञा नागानीकमुपाद्रवत्sa nāga iva nāgena govṛṣeṇeva govṛṣaḥsamāhūtaḥ svayaṃ rājñā nāgānīkamupādravatइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें