महाभारत 7.25.7विधमेदभ्रजालानि यथा वायुः समन्ततःव्यधमत्तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजःvidhamedabhrajālāni yathā vāyuḥ samantataḥvyadhamattānyanīkāni tathaiva pavanātmajaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें