महाभारत 7.26.4
इन्द्रादनवरः संख्ये गजयानविशारदःप्रथमो वा द्वितीयो वा पृथिव्यामिति मे मतिः
indrādanavaraḥ saṃkhye gajayānaviśāradaḥprathamo vā dvitīyo vā pṛthivyāmiti me matiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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