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महाभारत 7.27.5
किं नु संशप्तकान्हन्मि स्वान्रक्षाम्यहितार्दितान्इति मे त्वं मतं वेत्थ तत्र किं सुकृतं भवेत्
kiṃ nu saṃśaptakānhanmi svānrakṣāmyahitārditāniti me tvaṃ mataṃ vettha tatra kiṃ sukṛtaṃ bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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