महाभारत 7.28.14
एवमुक्तस्तु संक्रुद्धः शरवर्षेण पाण्डवम्अभ्यवर्षत्सगोविन्दं धनुरादाय भास्वरम्
evamuktastu saṃkruddhaḥ śaravarṣeṇa pāṇḍavamabhyavarṣatsagovindaṃ dhanurādāya bhāsvaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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