महाभारत 7.29.38
तुरगं रथिनं नागं पदातिमपि मारिषविनिर्भिद्य क्षितिं जग्मुर्वल्मीकमिव पन्नगाः
turagaṃ rathinaṃ nāgaṃ padātimapi māriṣavinirbhidya kṣitiṃ jagmurvalmīkamiva pannagāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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