महाभारत 7.3.5
शतक्रतोरिवाचिन्त्यं पुरा वृत्रेण निर्जयम्मोहनं सर्वसैन्यस्य युधि भीष्मस्य पातनम्
śatakratorivācintyaṃ purā vṛtreṇa nirjayammohanaṃ sarvasainyasya yudhi bhīṣmasya pātanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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