महाभारत 7.30.27ततः प्रविव्यथे सेना पाण्डवी भृशमाकुलाआचार्यपुत्रेण हते नीले ज्वलिततेजसिtataḥ pravivyathe senā pāṇḍavī bhṛśamākulāācāryaputreṇa hate nīle jvalitatejasiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें