महाभारत 7.31.30गिरिशृङ्गोपमश्चात्र नाराचेन निपातितःमातङ्गो न्यपतद्भूमौ नदीरोध इवोष्णगेgiriśṛṅgopamaścātra nārācena nipātitaḥmātaṅgo nyapatadbhūmau nadīrodha ivoṣṇageइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें