महाभारत 7.31.55
ते निकृत्तायुधाः शूरा निर्विषा भुजगा इवरथशक्तीः समुत्क्षिप्य भृशं सिंहा इवानदन्
te nikṛttāyudhāḥ śūrā nirviṣā bhujagā ivarathaśaktīḥ samutkṣipya bhṛśaṃ siṃhā ivānadan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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