महाभारत 7.31.65
शैनेयोऽप्यन्यदादाय धनुरिन्द्रायुधद्युतिसूतपुत्रं चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत्
śaineyo'pyanyadādāya dhanurindrāyudhadyutisūtaputraṃ catuḥṣaṣṭyā viddhvā siṃha ivānadat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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