महाभारत 7.34.12
अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्वा युधिष्ठिरःअविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रे समवासृजत्
aśakyaṃ tu tamanyena droṇaṃ matvā yudhiṣṭhiraḥaviṣahyaṃ guruṃ bhāraṃ saubhadre samavāsṛjat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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