महाभारत 7.34.17
धनंजयो हि नस्तात गर्हयेदेत्य संयुगात्क्षिप्रमस्त्रं समादाय द्रोणानीकं विशातय
dhanaṃjayo hi nastāta garhayedetya saṃyugātkṣipramastraṃ samādāya droṇānīkaṃ viśātaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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