महाभारत 7.38.10
घट्टयन्निव मर्माणि तव पुत्रस्य मारिषअभिमन्युं रणे दृष्ट्वा तदा रणविशारदम्
ghaṭṭayanniva marmāṇi tava putrasya māriṣaabhimanyuṃ raṇe dṛṣṭvā tadā raṇaviśāradam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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