Loading
महाभारत 7.44.3
प्रविश्यैव तु राजेन्द्र क्षत्रियेन्द्रान्तकोपमःसत्यश्रवसमादत्त व्याघ्रो मृगमिवोल्बणम्
praviśyaiva tu rājendra kṣatriyendrāntakopamaḥsatyaśravasamādatta vyāghro mṛgamivolbaṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें