महाभारत 7.45.13
लक्ष्मणेन तु संगम्य सौभद्रः परवीरहाशरैः सुनिशितैस्तीक्ष्णैर्बाह्वोरुरसि चार्पितः
lakṣmaṇena tu saṃgamya saubhadraḥ paravīrahāśaraiḥ suniśitaistīkṣṇairbāhvorurasi cārpitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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