महाभारत 7.45.5
हतान्भ्रातॄन्पितॄन्पुत्रान्सुहृत्संबन्धिबान्धवान्उत्सृज्योत्सृज्य समियुस्त्वरयन्तो हयद्विपान्
hatānbhrātṝnpitṝnputrānsuhṛtsaṃbandhibāndhavānutsṛjyotsṛjya samiyustvarayanto hayadvipān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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