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महाभारत 7.47.3
कर्णं चाप्यकरोत्क्रुद्धो रुधिरोत्पीडवाहिनम्कर्णोऽपि विबभौ शूरः शरैश्चित्रोऽसृगाप्लुतः
karṇaṃ cāpyakarotkruddho rudhirotpīḍavāhinamkarṇo'pi vibabhau śūraḥ śaraiścitro'sṛgāplutaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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