महाभारत 7.48.10
तावुद्यतगदौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौभ्रातृव्यौ संप्रजह्राते पुरेव त्र्यम्बकान्तकौ
tāvudyatagadau vīrāvanyonyavadhakāṅkṣiṇaubhrātṛvyau saṃprajahrāte pureva tryambakāntakau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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