महाभारत 7.48.1
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
विष्णोः स्वसानन्दिकरः स विष्ण्वायुधभूषितःरराजातिरथः संख्ये जनार्दन इवापरः
viṣṇoḥ svasānandikaraḥ sa viṣṇvāyudhabhūṣitaḥrarājātirathaḥ saṃkhye janārdana ivāparaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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