महाभारत 7.48.3
तच्चक्रं भृशमुद्विग्नाः संचिच्छिदुरनेकधामहारथस्ततः कार्ष्णिः संजग्राह महागदाम्
taccakraṃ bhṛśamudvignāḥ saṃcicchiduranekadhāmahārathastataḥ kārṣṇiḥ saṃjagrāha mahāgadām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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