महाभारत 7.5.37
अथाभिषिषिचुर्द्रोणं दुर्योधनमुखा नृपाःसेनापत्ये यथा स्कन्दं पुरा शक्रमुखाः सुराः
athābhiṣiṣicurdroṇaṃ duryodhanamukhā nṛpāḥsenāpatye yathā skandaṃ purā śakramukhāḥ surāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें