महाभारत 7.50.28
मृदुकुञ्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम्मत्तद्विरदविक्रान्तं शालपोतमिवोद्गतम्
mṛdukuñcitakeśāntaṃ bālaṃ bālamṛgekṣaṇammattadviradavikrāntaṃ śālapotamivodgatam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें