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महाभारत 7.50.5
अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पतिभुवि यद्दिक्षु चाप्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम्
aniṣṭaṃ caiva me śliṣṭaṃ hṛdayānnāpasarpatibhuvi yaddikṣu cāpyugrā utpātāstrāsayanti mām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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