महाभारत 7.51.22
धार्तराष्ट्रप्रियकरं मयि विस्मृतसौहृदम्पापं बालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम्
dhārtarāṣṭrapriyakaraṃ mayi vismṛtasauhṛdampāpaṃ bālavadhe hetuṃ śvo'smi hantā jayadratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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