महाभारत 7.51.34
अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो न ददाति चअनर्हते च यो दद्याद्वृषलीपत्युरेव च
arhate prātiveśyāya śrāddhaṃ yo na dadāti caanarhate ca yo dadyādvṛṣalīpatyureva ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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