महाभारत 7.54.6
रथाश्वनरनागानां प्रवृत्तमधरोत्तरम्क्रव्यादानां प्रमोदार्थं यमराष्ट्रविवृद्धये
rathāśvanaranāgānāṃ pravṛttamadharottaramkravyādānāṃ pramodārthaṃ yamarāṣṭravivṛddhaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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