महाभारत 7.55.28
ऋतुकाले स्वकां पत्नीं गच्छतां या मनस्विनाम्न चान्यदारसेवीनां तां गतिं व्रज पुत्रक
ṛtukāle svakāṃ patnīṃ gacchatāṃ yā manasvināmna cānyadārasevīnāṃ tāṃ gatiṃ vraja putraka
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें