महाभारत 7.56.13
अहत्वा सिन्धुराजं हि धूमकेतुं प्रवेक्ष्यतिन ह्येतदनृतं कर्तुमर्हः पार्थो धनंजयः
ahatvā sindhurājaṃ hi dhūmaketuṃ pravekṣyatina hyetadanṛtaṃ kartumarhaḥ pārtho dhanaṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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