Loading
महाभारत 7.56.28
श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम्मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम्
śvastāṃ cakrapramathitāṃ drakṣyase nṛpavāhinīmmayā kruddhena samare pāṇḍavārthe nipātitām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें