महाभारत 7.56.38
सर्वोपायैर्यतिष्यामि यथा बीभत्सुराहवेपश्यतां धार्तराष्ट्राणां हनिष्यति जयद्रथम्
sarvopāyairyatiṣyāmi yathā bībhatsurāhavepaśyatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ haniṣyati jayadratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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