महाभारत 7.57.7
किमर्थं च विषादस्ते तद्ब्रूहि वदतां वरन शोचितव्यं विदुषा शोकः कार्यविनाशनः
kimarthaṃ ca viṣādaste tadbrūhi vadatāṃ varana śocitavyaṃ viduṣā śokaḥ kāryavināśanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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