महाभारत 7.59.21
निहत्य सैन्धवं जिष्णुरद्य त्वामुपयास्यतिविशोको विज्वरो राजन्भव भूतिपुरस्कृतः
nihatya saindhavaṃ jiṣṇuradya tvāmupayāsyativiśoko vijvaro rājanbhava bhūtipuraskṛtaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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