महाभारत 7.64.7
विष्वग्वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणःववुरायाति कौन्तेये संग्रामे समुपस्थिते
viṣvagvātāḥ sanirghātā rūkṣāḥ śarkaravarṣiṇaḥvavurāyāti kaunteye saṃgrāme samupasthite
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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