महाभारत 7.65.13
काष्ठातीत इवादित्यः प्रतपन्युगसंक्षयेददृशे दिक्षु सर्वासु पार्थः परपुरंजयः
kāṣṭhātīta ivādityaḥ pratapanyugasaṃkṣayedadṛśe dikṣu sarvāsu pārthaḥ parapuraṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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