महाभारत 7.66.26
प्रसक्तान्पततोऽद्राक्ष्म भारद्वाजस्य सायकान्मण्डलीकृतमेवास्य धनुश्चादृश्यताद्भुतम्
prasaktānpatato'drākṣma bhāradvājasya sāyakānmaṇḍalīkṛtamevāsya dhanuścādṛśyatādbhutam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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