महाभारत 7.66.7
एवमुक्तस्तदाचार्यः प्रत्युवाच स्मयन्निवमामजित्वा न बीभत्सो शक्यो जेतुं जयद्रथः
evamuktastadācāryaḥ pratyuvāca smayannivamāmajitvā na bībhatso śakyo jetuṃ jayadrathaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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