महाभारत 7.67.3
अश्वो विद्धो ध्वजश्छिन्नः सारोहः पतितो गजःछत्राणि चापविद्धानि रथाश्चक्रैर्विना कृताः
aśvo viddho dhvajaśchinnaḥ sārohaḥ patito gajaḥchatrāṇi cāpaviddhāni rathāścakrairvinā kṛtāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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