महाभारत 7.68.36
शरैः सहस्रशो विद्धा द्विपाः प्रस्रुतशोणिताःव्यदृश्यन्ताद्रयः काले गैरिकाम्बुस्रवा इव
śaraiḥ sahasraśo viddhā dvipāḥ prasrutaśoṇitāḥvyadṛśyantādrayaḥ kāle gairikāmbusravā iva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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