महाभारत 7.68.52
स वाजिरथमातङ्गान्निघ्नन्व्यचरदर्जुनःप्रभिन्न इव मातङ्गो मृद्नन्नडवनं यथा
sa vājirathamātaṅgānnighnanvyacaradarjunaḥprabhinna iva mātaṅgo mṛdnannaḍavanaṃ yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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