महाभारत 7.68.55
शून्यान्कुर्वन्रथोपस्थान्मानवैः संस्तरन्महीम्प्रानृत्यदिव संबाधे चापहस्तो धनंजयः
śūnyānkurvanrathopasthānmānavaiḥ saṃstaranmahīmprānṛtyadiva saṃbādhe cāpahasto dhanaṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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