महाभारत 7.69.59
एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसःतेजो हृतं नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम्
evamuktāstu te sarve pratyūcustaṃ divaukasaḥtejo hṛtaṃ no vṛtreṇa gatirbhava divaukasām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें