महाभारत 7.69.7
असौ धनंजयाग्निर्हि कोपमारुतचोदितःसेनाकक्षं दहति मे वह्निः कक्षमिवोत्थितः
asau dhanaṃjayāgnirhi kopamārutacoditaḥsenākakṣaṃ dahati me vahniḥ kakṣamivotthitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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