महाभारत 7.77.24
तदस्य क्षत्रियास्तत्र सर्व एवाभ्यपूजयन्यदर्जुनहृषीकेशौ प्रत्युद्यातोऽविचारयन्
tadasya kṣatriyāstatra sarva evābhyapūjayanyadarjunahṛṣīkeśau pratyudyāto'vicārayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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