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महाभारत 7.78.31
ते रथैर्बहुसाहस्रैः कल्पितैः कुञ्जरैर्हयैःपदात्योघैश्च संरब्धैः परिवव्रुर्धनंजयम्
te rathairbahusāhasraiḥ kalpitaiḥ kuñjarairhayaiḥpadātyoghaiśca saṃrabdhaiḥ parivavrurdhanaṃjayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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