महाभारत 7.8.33
क्षिप्रहस्तश्च बलवान्दृढधन्वारिमर्दनःन यस्य जीविताकाङ्क्षी विषयं प्राप्य जीवति
kṣiprahastaśca balavāndṛḍhadhanvārimardanaḥna yasya jīvitākāṅkṣī viṣayaṃ prāpya jīvati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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