महाभारत 7.81.2
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
अपराह्णे महाराज संग्रामे लोमहर्षणेपाञ्चालानां कुरूणां च द्रोणे द्यूतमवर्तत
aparāhṇe mahārāja saṃgrāme lomaharṣaṇepāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca droṇe dyūtamavartata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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