महाभारत 7.82.5
अथान्यद्धनुरादाय बृहत्क्षत्रो हसन्निवव्यश्वसूतध्वजं चक्रे क्षेमधूर्तिं महारथम्
athānyaddhanurādāya bṛhatkṣatro hasannivavyaśvasūtadhvajaṃ cakre kṣemadhūrtiṃ mahāratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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