महाभारत 7.82.7
तच्छिन्नं सहसा तस्य शिरः कुञ्चितमूर्धजम्सकिरीटं महीं प्राप्य बभौ ज्योतिरिवाम्बरात्
tacchinnaṃ sahasā tasya śiraḥ kuñcitamūrdhajamsakirīṭaṃ mahīṃ prāpya babhau jyotirivāmbarāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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